
जय श्री राम
साकेतवासी मानस -मार्तण्ड गोस्वामी श्री इन्दुभूषण जी महाराज (रामायणी जी)
(महिमा दर्शन)
आप किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, इसलिए हम आपके जीवन का परिचय दें, इतनी हमारी योग्यता नहीं। आप तो साक्षात् मानस के सूर्य हैं, इसलिए हम आपकी महिमा ही कह सकते हैं।*
जन्म और परिवार:
साकेतवासी मानस मार्तण्ड गोस्वामी श्री इन्दुभूषण रामायणी जी का जन्म श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर 15 अगस्त 1920 को रात्रि 11:55 बजे सिल्क सिटी भागलपुर, बिहार में एक प्रतिष्ठित शाकद्वीपीय ब्राह्मण परिवार में हुआ। आपके पिताश्री साकेतवासी पंडित श्री राधेश्याम पाठक जी और माता श्रीमती भगवती देवी जी थीं। आपका प्रारंभिक नाम बोधनाथ पाठक, बाद में इंदु जी था। आप साकेतवासी पंडित श्री रामगुलाम जी महाराज, काशी (भागवत-टीकाकार) के पौत्र थे जिनकी भागवत पर टीका आज भी काशी नरेश लाइब्रेरी में सुरक्षित है। आपका वंश-वृक्ष अत्यंत विशाल एवं विस्तृत रहा।
शिक्षा और कथा में प्रवेश:
आपकी प्रारंभिक शिक्षा भागलपुर में हुई। ब्रिटिश शासन के दौरान आपने B.A. (अंग्रेजी में) और संस्कृत आचार्य साहित्य की उपाधि प्राप्त की। परिवार में सबसे बड़े पुत्र होने के बावजूद, आपने सरकारी रेलवे सेवा (R.M.S.) का अवसर ठुकरा दिया और श्री अवध नरेश राम की कृपा से आप कथा क्षेत्र में आए।”श्री राम-कथा सेवा को ही जीवन-व्रत बना लिया। बचपन से ही आप अपने बड़े भाई के साथ (शंका-समाधान) कथा-सेवा करते थे। आपके बचपन के मित्र चित्रशाला के श्री हरिकुंज जी, प्रसिद्ध अभिनेता अशोक कुमार जी और गोकुल चंद्र जी थे जो जीवन भर आपके साथ रहे।
स्वतंत्रता संग्राम और वृन्दावन:
आपने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सक्रिय रूप से भाग लिया और आप एक स्वतंत्रता सेनानी थे। ब्रिटिश दमन के कारण आप लंबे समय तक वृन्दावन में छिपकर रहे। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता के बाद, आप अपने परिवार के साथ फिर से मिले। आपने कहा था – “जहाँ पेड़, लताएँ और पत्ते राधे-राधे जपते हैं, वहाँ भाग्य से मुझे मानस मिला।” इस दौरान, आपको ब्रज-विभूति प्रसिद्ध राम कथाकार गोस्वामी श्री बिंदु जी महाराज (मोहन-मोहिनी के लेखक) का सानिध्य प्राप्त हुआ, जिन्होंने आपको स्नेहपूर्वक*इन्दु* नाम दिया। “उस दौर में जब रामचरितमानस हास्य और लोकगीत का विषय था, उस समय आपने गोस्वामी श्री बिंदु जी महाराज एवं श्री कपिल जी महाराज के सहयोग से रामचरितमानस को गरिमामय व्यासपीठ पर स्थापित किया
मानस-मंदिर और अखंड पाठ:
मानस चतुःशती, रामचरितमानस के 400 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आपने 1957 में वृन्दावन में ब्रह्म कुंड के पास मानस-मंदिर का निर्माण कराया। वहाँ आपके पिता पंडित श्री राधेश्याम कंज जी द्वारा श्री अंजनीनंदन हनुमानजी की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। 10 जुलाई 1969, पुरुषोत्तमी एकादशी आषाढ़ माह को, श्री रामचरितमानस का अखंड पारायण शुरू किया गया, जो लगभग 45 वर्षों तक ब्रजवासियों के सहयोग से निरंतर चलता रहा।
जन-सेवा:*वृंदावन नगर पालिका में वरिष्ठ कार्यवाहक शिक्षा चेयरमैन एवं सदस्य के रूप में पद पर रहकर आपने जन-मानस की सेवा की।*
राष्ट्रीय नेतृत्व और सद्भावना सम्मेलनभागलपुर में हुए भीषण साम्प्रदायिक दंगों के समय पूज्य दादा जी एक युद्धपोत की भाँति दृढ़तापूर्वक खड़े हुए और शांति एवं सद्भाव स्थापित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्री हनुमान जी महाराज की कृपा से आपने उस भीषण नरसंहार के केंद्र तातपुर, भागलपुर क्षेत्र में अपने सिंह समान पराक्रम का परिचय देते हुए स्वयं वहाँ जाने का संकल्प लिया।उस समय स्थानीय प्रशासन द्वारा वहाँ जाने की अनुमति न दिए जाने पर आपने अपने शिष्य एवं तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र जी से वहाँ जाने की अनुमति प्रदान करने का आग्रह किया। अनुमति प्राप्त होने के पश्चात आप तातपुर पहुँचे और वहाँ मुस्लिम समुदाय के प्रमुख प्रतिनिधि सरफरे आलम खान जी से संवाद स्थापित किया।आपने सरफरे आलम खान जी के गले में श्रीराम नाम अंकित दुपट्टा डालकर उन्हें आत्मीयता एवं सद्भाव का संदेश दिया और उनके द्वारा दिया गया दुपट्टा स्वयं धारण किया। यह दृश्य उस समय के तनावपूर्ण वातावरण में प्रेम, विश्वास, समन्वय और पारस्परिक सद्भाव का जीवंत प्रतीक बन गया।आपने वहाँ राजनीति से नहीं, रामनीति से सद्भाव और समन्वय स्थापित किया। श्रीराम के आदर्शों को आधार बनाकर आपने धर्म, सम्प्रदाय और मत-पंथ की सीमाओं से ऊपर उठकर समाज को शांति एवं भाईचारे का संदेश दिया।इसी सद्भावना की भावना को आगे बढ़ाते हुए आपने “मानस सद्भावना सम्मेलन” की परंपरा का शुभारंभ किया, जिसमें विभिन्न धर्मों एवं सम्प्रदायों के धार्मिक गुरु, संत एवं प्रतिनिधि एक मंच पर उपस्थित होकर अपने विचार रखते और समाज में प्रेम, शांति, एकता, सद्भाव एवं समन्वय का संदेश देते रहे।इस प्रकार, भागलपुर की उस विषम परिस्थिति में आपके साहस, नेतृत्व और श्रीरामभक्ति ने यह सिद्ध किया कि जहाँ राजनीति विभाजन की भाषा बोलती है, वहाँ रामनीति प्रेम, समन्वय और सद्भाव का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
सद्गुरु दीक्षा:*आपके सद्गुरुदेव *अनंत श्री विभूषित महंत श्री गंगादास जी महाराज, जगन्नाथपुरी (छोटा छत्ता, जगन्नाथपुरी एवं मणिरामदास छावनी, अयोध्या)* आपकी कथा का आयोजन कराने हेतु आपको आमंत्रित करने के लिए वृंदावन में आपके निवास *मानस मंदिर* पर पधारे।उनके दिव्य वपु, आजानुबाहु स्वरूप और दिव्य जटा-जूट के दर्शन कर आप मंत्रमुग्ध हो गए। तत्पश्चात आपने जगन्नाथपुरी में जाकर उनके आश्रम में रामकथा का गायन किया। आपकी कथा और आपकी ओजस्वी वाणी से प्रभावित होकर उन्होंने आपको *श्रीराम मंत्र से रामानंद संप्रदाय में दीक्षा* प्रदान की।
कथा-यात्रा, सत्संग और सम्मान:
आपके नित्य सत्संग स्थान थे – श्री हि की कुंज, गिरधारी मंदिर, छत्तीसगढ़ वाली कुंज, सुदामा कुटी, अखंडानंद आश्रम, सुखदा भक्ति आश्रम, लीलाबाई सत्संग भवन। सर्वप्रथम वृन्दावन नगरपालिका द्वारा स्वामी श्री रामस्वरूप शर्मा जी द्वारा सम्मानित। आपको (मानस मर्मज्ञ), (मानस तत्ववेत्ता), (मानस मार्तण्ड) द्वारा ब्रज साहित्य संगम, मेघश्याम स्मृति सम्मान, मोरारी बापू जी द्वारा तुलसी पुरस्कार, दक्षिण अफ्रीका में ‘हिन्दू भूषण’ जैसे सम्मान प्राप्त हुए। आपकी मंचीय आयु 74 वर्ष थी। आपने विदेशों में भी राम कथा का प्रचार किया (इंग्लैंड*दक्षिण अफ्रीका, फिजी, कनाडा, मॉरीशस, नेपाल)
देशों में आपने रामकथा का गायन किया, तथा सम्पूर्ण भारतवर्ष में रामध्वज लहराया।
जिस समय आपकी आयु 94 वर्ष की थी, तब आपसे मिलने तथा प्रेम मंदिर के उद्घाटन समारोह का आमंत्रण देने जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज मानस मंदिर पधारे और आपसे भेंट की।*
साहित्यिक उपलब्धि:
हनुमान चालीसा भाष्य, 2. विभीषण, 3. भक्तराज जटायु, 4. भक्तराज केवट, 5. भक्तराज शबरी, 6. तुलसी मानस मंजरी, 7. सुंदर कांड पाठ।
अंतिम कथा, साकेत गमन
आपका साकेत गमन 9 मार्च 2011 को तदनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी को हुआ था।*आपका साकेत गमन 9 मार्च 2011 को तदनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को हुआ था। उससे कुछ दिन पूर्व ही आपने वृंदावन स्थित कात्यायनी शक्तिपीठ में परम पूज्य ब्रह्मलीन श्री वृंदावन जी महाराज जी के आयोजकत्व में रामकथा गायी थी। उसी समय से आपने अपने साकेत गमन के संकेत अपने अनुयायियों को देने शुरू कर दिए थे।**आप अपने अनुयायियों से अक्सर कहा करते थे कि “कल मिलेंगे”, लेकिन 8 मार्च 2011 की संध्या को आपने अपने अनुयायियों से कहा कि “अब फिर मिलेंगे” और 9 मार्च के प्रातः आप राम गुण गाते-गाते साकेत धाम को प्रस्थान कर गए।*आपके प्रकल्प:- अखंड पारायण, मानस-मंदिर, हनुमान जी*श्री संकट मोचन हनुमान जी की प्रत्येक मंगलवार तथा शनिवार को चोला श्रृंगार सेवा* सेवा और हनुमत गौ सदन आज भी चल रहे हैं। आपके साकेत गमन के उपरांत आपके अनुयायियों तथा आपके कथा प्रेमियों के द्वारा वृंदावन में आए हुए आगंतुक दर्शनार्थियों के लिए शीतल आरो जल की सेवा तथा अन्य प्रसाद की सेवा भी चल रही है।*
क्षमा-प्रार्थनाश्री रामकथा के प्रति आपकी प्रीति, प्रतीति एवं अनुरक्ति अनंत जलराशि के समान अथाह है। उस अनंत भक्ति-सागर की महिमा का वर्णन करने का हमारा यह अल्प प्रयास उस अबला के समान है, जो अथाह सागर के उस पार जाना तो चाहती है, किंतु उसके पास न कोई नौका है और न ही उस पार पहुँचने का कोई साधन।ठीक उसी प्रकार, आपकी श्रीरामकथा के प्रति अगाध प्रीति, अटूट निष्ठा और अनंत अनुराग का पूर्ण पार पाना हमारी अल्प बुद्धि एवं सीमित सामर्थ्य के लिए संभव नहीं है। हमने श्रद्धा और भाव से आपके जीवन एवं श्रीरामकथा-साधना के प्रसंगों को शब्दों में पिरोने का एक विनम्र प्रयास मात्र किया है।अतः इस महिमा-दर्शन में यदि कहीं कोई शाब्दिक अथवा तथ्यगत त्रुटि रह गई हो, किसी तिथि, प्रसंग अथवा जीवन-वृत्तांत का कोई अंश अनजाने में छूट गया हो, तो हम आपके समस्त परिकर एवं आत्मीयजनों से करबद्ध क्षमा-प्रार्थी हैं। कृपया इसे हमारी भूल न मानकर हमारी अल्पबुद्धि और सीमित सामर्थ्य समझकर स्वीकार करें तथा किसी भी त्रुटि के लिए बुरा न मानें।आपकी महिमा अनंत है,हमारे शब्द सीमित हैं।आपकी रामकथा-भक्ति अथाह है,और हमारी लेखनी उस अथाह सागर के तट पर खड़ी एक छोटी-सी नौका मात्र है।श्रीरामकथा की यह पावन धारा अनंत काल तक प्रवाहित होती रहे—यही श्रीचरणों में प्रार्थना है।
त्वदीयं वस्तु गोविन्द, तुभ्यमेव समर्पये।*
सौजन्य – श्री राम कथा सत्संग ट्रस्ट (पंजी.), , मानस मंदिर, वृन्दावन ब्रह्मकुंड